खुद को मानते हैं भगवान श्री कृष्ण की गाय, उन्हीं की तरह पीते हैं पानी, ‘मौनिया’ भेंट करते हैं मोर पंख

गोवर्धन पूजा (Govardhan Puja) देश में बड़े स्तर पर मनाई जाती है. यूपी के बुंदेलखंड इलाके में गोवर्धन पूजा का महत्व सबसे ज्यादा है. भगवान श्री कृष्ण का क्षेत्र कहे जाने वाले बुंदेलखंड के रहने वाले लोग खास तरीके से पूजन करते हैं. यह लोग यादव जाति है होते हैं और खुद को श्री कृष्ण का वंशज मानते हैं. 

हमीरपुर जिले में इस दिन मोर पंखों से गोवर्धन की पूजा की जाती है. सैकड़ों गांवों के लोग लाखों की तादाद में मोर पंख भगवान श्री कृष्ण को और अपने देवताओं को अर्पित करते हैं. मोर पंखों के बड़े-बड़े बंडल लेकर मौन व्रत धारण किए हुए बच्चे, बड़े, बूढ़े सभी लंबी दूरी तय कर अपने मंदिरों में जाकर पूजन करते हैं. मोर पंख लिए इन लोगों को ”मौनिया” कहा जाता है.

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भारी भीड़ होती है जमा 

बुंदलखंड के गांवों में आज भी इस प्राचीन परंपरा का पालन किया जाता है. मौन व्रत रखकर मौनिये मोर पंखों के मोटे-मोटे बंडल लेकर नाचते-थिरकते हुए देव स्थानों में जाकर गोवर्धन पूजा करते हैं. इस अनोखी पूजा को देखने के लिए भारी भीड़ जमा होती है. इस इलाके के हर गांव, गलियों में मौनिये मोर पंखों के बंडल के साथ देखे जाते हैं. 

देवस्थानों पर पूजा करते हुए मौनिए (फाइल फोटो).

ढोलक की थाप पर थिरकते हैं मौनिए 

बुंदेलखंड के बांदा, हमीरपुर, जालौन, झाँसी, चित्रकूट जिलों के गांव-जंगल में मौनियों के झुंड बुंदेलखंड का प्रसिद्ध ”दिवारी नत्य” भी करते हैं. ढोलक की थाप पर मौनिये भी मोर पंख लिए थिरकते नजर आते हैं. लाठियों से एक दूसरे पर वार करते मोनिए डांस करते हैं. मगर, वार भी इस तरह किया जाता है कि किसी को चोट नहीं आए.

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हर बंडल में 2 हजार से ज्यादापंख

मौनियों के हाथ में जो मोर पंख के बंडल होते हैं, उनमें दो से ढाई हजार पंख होते हैं. हर साल इन पंखों की संख्या भी बढ़ाई जाती है. जंगलोंं में जाकर पंखों को ढूंढकर इकठ्ठा किया जाता है. किसी भी तरह से मोर को नुकसान नहीं पहुंचाया जाता है.

इसलिए कहा जाता है ‘मौनिया’

इस पूजा में शामिल होने के लिए मौन व्रत रखे जाने की परंपरा है. सैकड़ों लोग साथ में मौजूद होते हैं, लेकिन कोई किसी से बात नहीं करता. मौन रहना पूजा में बहुत जरुरी है. इसलिए इन्हें ”मौनिया” कहा जाता है. इनका मानना है कि ऐसा करने से उनको कृष्ण का सानिध्य और आर्शीवाद दोनों मिलता है. सभी यादव जाति के होते हैं.

हर बंडल में होते हैं दो हजार से ज्यादा पंख.

खुद को मानते हैं भगवान श्री कृष्ण की गाय

मौनियों का जत्था जहां से निकलता है, वहां देखने वालो की भीड़ लग जाती है. दिवाली की रात से ही ये लोग मौन व्रत रख लेते हैं. पूरे दिन मंदिरों में ऐसे ही घूमते-फिरते हैं. जब इन्हें प्यास लगती है तब वो एक बड़े से बर्तन में वैसे ही पानी पीते है जैसी कृष्ण की गाएं पिया करती थीं. मुंह में हरी घास दबाकर अपने हाथ पीछे करके पानी पीते है. ऐसा करके वो पूरी तरह से कृष्ण की गायों की ही तरह बन जाते हैं.

12 साल रखना होता है व्रत, चित्रकूट में तोड़ते हैं

मान्यता है कि जो भी व्यक्ति एक बार भी मौनिया बनता है, उसे लगातार 12 साल तक व्रत करना होता है. मौनिया वही बनता है, जो गाय की तरह आचरण कर पाता है. यदि किसी भी साल में मौनिया अपना व्रत तोड़ लेता है, तो उसे गोमूत्र और गोबर के जरिए प्राश्चित करता पड़ता है. जो भी 12 साल के इस कठिन व्रत को करता है, वह अंत में चित्रकूट जाकर व्रत को तोड़ना है. 

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