तिब्बत के पिघलते ग्लेशियरों में मिले 15,000 साल पुराने वायरस

हाल ही में एक स्टडी की गई जिसमें यह चेतावनी दी गई थी कि अगली महामारी ग्लेशियरों के पिघलने की वजह से आएगी. शोध में कहा गया था कि कोरोना के सभी वैरिएंट्स से खतरनाक वायरस और बैक्टीरिया ग्लेशियरों में छिपे हैं. वैज्ञानिकों को इन ग्लेशियरों में वायरस मिलने शुरू हो गए हैं. ग्लेशियरों की बर्फ पिघल रही है और वहां से ये प्राचीन जीव अब उभरने लगे हैं. ये वापस आ रहे प्राचीन वायरस हमारे लिए अच्छे नहीं हैं. बर्फ पिघलने से बाहर आए ये वायरस वातावरण में फैल सकते हैं. 

माइक्रोबायोम (Microbiome) में प्रकाशित शोध में, शोधकर्ताओं ने तिब्बती पठार के गुलिया आइस कैप से दर्जनों अनोखे वायरसों की पहचान की है. यह वायरस करीब 15,000 साल पुराने बताए जा रहे हैं. शोध के मुख्य लेखक और ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी के माइक्रोबायोलॉजिस्ट ज़ी पिंग जॉन्ग (Zhi-Ping Zhong) का कहना है कि ये ग्लेशियर धीरे-धीरे बने थे. धूल और गैसों के साथ-साथ कई वायरस भी उस बर्फ में जमा हो गए. 

 बैक्टीरियोफेज वायरस (Photo: Professor Graham Beards)

पिछले अध्ययनों से पता चला है कि सूक्ष्मजीव समुदायों का संबंध, वातावरण में धूल और आयन सांद्रता में परिवर्तन से जुड़ा होता है. यह उस समय की जलवायु और पर्यावरणीय परिस्थितियों का भी संकेत देता है. शोधकर्ताओं का कहना है कि प्राचीन काल के इन जमे ग्लेशियरों में, चीन में समुद्र तल से 6.7 किलोमीटर ऊपर, 33 में से 28 वायरस पहले कभी नहीं देखे गए थे.

ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी के माइक्रोबायोलॉजिस्ट मैथ्यू सुलिवन का कहना है कि ये ऐसे वायरस हैं जो कठिन वातावरण में पनपे होंगे. ज्ञात वायरसों के डेटाबेस से इन वायरसों के जेनेटिक सीक्वेंस की तुलना करने पर टीम ने पाया कि बर्फ के दोनों नमूनों में सबसे जो वायरस सबसे ज्यादा मात्रा में थे वे बैक्टीरियोफेज वायरस थे, जो मिथाइलोबैक्टेरियम (Methylobacterium) को संक्रमित करते हैं. मिथाइलोबैक्टेरियम बैक्टीरिया बर्फ के अंदर मीथेन चक्र के लिए अहम होते हैं.
    
ये वायरस, पौधों और मिट्टी के मिथाइलोबैक्टीरियम स्ट्रेंस में रहने वाले वायरस से सबसे ज्यादा मेल खाते थे. टीम ने निष्कर्ष निकाला कि ये जमे हुए वायरस हो सकता है कि मिट्टी या पौधों से उत्पन्न होते हैं और अपने होस्ट के लिए पोषक तत्व इकट्ठा करते हैं. जबकि COVID-19 महामारी के बाद, यह वायरस और भी डर पैदा करते हैं. सबसे बड़ा खतरा तो यह भी है कि पिघलती हुई बर्फ बड़ी मात्रा में सीक्वेंस्ड मीथेन और कार्बन छोड़ रही है.

 

पृथ्वी वैज्ञानिक लोनी थॉम्पसन का कहना है कि हम कठिन वातावरण में रहने वाले वायरस और रोगाणुओं के बारे में बहुत कम जानते हैं. हम नहीं जानते कि जलवायु परिवर्तन पर बैक्टीरिया और वायरस कैसे प्रतिक्रिया करते हैं और तब क्या होता है जब हम हिमयुग से गर्म वातावरण में जाते हैं, जिसमें हम अभी हैं. अभी बहुत कुछ खोजा जाना बाकी है.



Source Link

Read in Hindi >>